FIR कैसे लिखवाएं

इस पेज पर जो भी लिखा गया है वह आसान शब्दों में और आसानी से समझने के लिए ही लिखा गया है इसे लखने का इतना ही उद्देश्य है की सरलता से समझा जा सके
  इस लेख में हम आप FIR कैसे लिखवाया जाए इसे और इससे संबंधित बातें समझेंगे । FIR क्या है 2. जमानतीय अपराध क्या है          3. अजमानतीय अपराध क्या होता है 4 FIR लिखवाने के लिए प्रार्थना पत्र में क्या लिखें। 5.पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें6.धारा 156(3) के तहत न्यायालय में आवेदन 7.ऑनलाइन e-FIR कैसे दर्ज करें 8. FIR लिखवाने का प्रार्थना पत्र / तहरीर का प्रारूप
FIR कैसे लिखवाये-
एफआईआर दर्ज कराना हर व्यक्ति का कानूनी अधिकार है,
अगर आपके साथ या किसी अन्य के साथ कोई अप्रिय घटना संज्ञेय अपराध घटित हुआ है और आप मुकदमा दिखाना चाहते हैं तो मुकदमा लिखने के लिए सबसे पहले जिस थाना क्षेत्र में घटना घटित हुआ है उस थाने पर जाएं और घटना से संबंधित प्रार्थना पत्र पहले से लिखकर ले जाएं और प्रार्थना पत्र को सरल तथा स्पष्ट भाषा में रखें। उसमें घटना कब हुई, कहां हुई, क्या हुआ, किसने किया (अगर जानकारी हो) और आपके पास कौन-कौन से सबूत हैं, ये सभी बातें जरूर लिखें।
थाने पर जाकर थाना अध्यक्ष को प्रार्थना पत्र दे तथा अपना मुकदमा पंजीकृत काराये।
ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य, [(2014) 2 SCC 1]
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि दी गई सूचना संज्ञेय अपराध के घटित होने के सम्बन्ध में है, तो FIR दर्ज करना अनिवार्य है। ऐसे मामलों में प्रारंभिक जांच की अनुमति नहीं है, सिवाय कुछ सीमित प्रकरण जैसे वैवाहिक विवाद, वाणिज्यिक अपराध या चिकित्सकीय लापरवाही आदि के मामले में ।
FIR लिखने के लिए घटना से सम्बन्धित व्यक्ति निम्म प्रकार का प्रार्थना पत्र /तहरीर थाने के प्रभारी निरीक्षक/ थानाध्यक्ष को देता है ।धारा 173 BNSS / धारा 154 Cr.P.C.
प्रारूप निम्नवत है
सेवामे ,
प्रभारी निरीक्षक / थानाध्यक्ष महोदय
थाना ……………जनपद ………………
विषय – प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के सम्बन्ध मे प्रार्थना पत्र
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मै प्रार्थी ……………पुत्र………….ग्राम/ मोहल्ला …………..थाना …………जनपद …………..का निवासी हू दिनांक ………को समय करीब ………..बजे( घटना स्थल का नाम)स्थान………पर (अभियुक्तगण) के द्वारा (घटना का संक्ष्प्त विवरण जैसे कि मुझे व किसी अन्य व्यक्ति को मारापीटा जानसे मारने की धमकी दी आदि) घटना की गयी है ।
अतः श्रीमान जी से प्रार्थना है कि रिपोर्ट दर्ज कर आवश्यक कार्यवाही करने की कृपा करे
                                                                                           प्रार्थी
हस्ताक्षर
नाम पता
मो0नं0
FIR लिखवाने के लिए दिये गये प्रार्थना पत्र मे निम्न बातो को समाहित करना चाहिए तथा निम्न बात को ध्यान रखना चाहिए
प्रार्थना पत्र देने वाले का पूरा नाम व पता मोबाईल नं0
दिनांक घटना व समय
घटना स्थल
बनाम ( जिसके द्वारा घटना कारित की गयी )
FIR मे घटना की सही तथा साफ सुथरा स्पष्ट भाषा मे लिखना चाहिए
FIR गलत दर्ज कराना दण्डनीय अपराध है
FIR लिखवाने के बाद उसकी प्रति प्राप्त करे जो निःशुल्क मिलती है
जब किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी पुलिस को दी जाती है, तो पुलिस FIR दर्ज करती है।
किसी भी थाने पर दिया गया प्रार्थना पत्र तब तक FIR नही होता है जब तक पीड़ित द्वारा दिए गए प्रार्थना पत्र के सारांश को जीडी में इंद्राज करके मुकदमे की कायमी नहीं की जाती तथा सीसीटीएनएस पर चिक किता नहीं किया जाता तब तक वह FIR नहीं माना जाता है मात्र जांच हेतु प्रार्थना पत्र माना जाता है FIR जीडी में कायमी और चिक कट जाने के बाद माना जाता है।
जब थाने से आपको FIR की कॉपी मिल जाए तब आप यह मान ले कि आपका मुकदमा लिखा गया है यदि मात्रा एप्लीकेशन को ले लिया गया और फिर FIR कॉपी नहीं मिली तो आपका मुकदमा तब तक नहीं लिखा गया है।
अगर आपकी बात नहीं सुनी जाती, मुकदमा नहीं पंजीकृत किया जाता तब आप जिले के उच्च अधिकारियों जैसे पुलिस अधीक्षक को अपनी शिकायत भेज सकते हैं। आज के समय में यह काम डाक के साथ-साथ ऑनलाइन माध्यम से भी आसानी से किया जा सकता है, जिससे आपकी शिकायत सीधे बड़े अधिकारियों तक पहुंच जाती है।
यदि फिर भी कोई कार्रवाई नहीं होती, तो आपके पास अदालत जाने का विकल्प भी होता है। आप मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन देकर यह अनुरोध कर सकते हैं कि आपकी एफआईआर दर्ज कराई जाए। इसके लिए एक प्रार्थना पत्र देना होता है, जिसमें आप पूरी घटना का विवरण और यह भी लिखते हैं कि आपने पहले पुलिस थाने से संपर्क किया है तथा पुलिस अधीक्षक को भी प्रार्थना पत्र दे चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। अदालत इस मामले को गंभीरता से लेकर उचित आदेश दे सकती है। यदि आपके साथ गलत हुआ है, तो उसकी शिकायत करना आपका हक है। सही तरीके और धैर्य के साथ प्रयास करने पर आपकी एफआईआर जरूर दर्ज होगी और आपको न्याय मिलेगा।
जब थाने पर मुकदमा न लिखा जाए
यदि थाने पर FIR लिखने से मना करे तो जिले के पुलिस अधीक्षक को लिखित प्रार्थना दे
यदि फिर भी FIR नही लिखा जा रहा है तो आप सम्बन्धित न्यायालय के समक्ष धारा 156(3) CrPC के तहत प्रार्थना पत्र दे ।
आज के समय में कई राज्यों में ऑनलाइन एफआईआर की सुविधा भी शुरू हो चुकी है, जिससे लोग घर बैठे ही अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं। यह तरीका खासकर छोटे मामलों में बहुत सुविधाजनक है और इससे समय की भी बचत होती है। साथ ही, आपके पास शिकायत का एक रिकॉर्ड भी रहता है, जो आगे चलकर आपके काम आ सकता है।
आनलाईन e FIR कैसे दर्ज करे
1.राज्य की वेबसाइट पर जाए
2.online FIR या e- FIR पर क्लिक करे
-मोबाईल नं0 से ओटीपी लागिन करे
-घटना का विवरण भरे
FIR सबमिट करे
यदि कोई गम्भीर घटना किसी व्यक्ति के साथ अथवा उसके सामने य उसके किसी सम्बन्धी के साथ घटित होती है तो व्यक्ति को यह कानूनी अधिकार है कि वह FIR दर्ज करा सकता है । संज्ञेय अपराध के घटित होने पर पुलिस FIR दर्ज करे इसका उल्लेख CrPC के धारा 154 मे तथा FIR दर्ज करना वर्णित किया गया है ।
किसी संज्ञेय अपराध घटित होने पर FIR घटित घटना के सम्बन्ध मे थाने पर दर्ज की जाती है जब कोई संज्ञेय अपराध के घटित होने की सूचना थाना प्रभारी को मिलती है तो सबसे पहले FIR लिखकर पुलिस तत्काल कार्यवाही सुरू करती है
संज्ञेय अपराध ।
संज्ञेय अपराध वह अपराध होता है जिसमे पुलिस को यह अधिकार है कि वह बिना वारन्ट के अभियुक्त को गिरफ्तार कर सकती है इसकी विवेचना पुलिस मान0न्या0 के अनुमति के बिना कर सकती है यह अपराध तीन वर्ष या उससे अधिक के सजा वाले अपराध होते है संज्ञेय अपराध दो प्रकार के होते है।
1.जमानतीय अपराध
जमानतीय अपराध वह अपराध है जिसमे अभियुक्त को जमानत पाने का अधिकार है इसमे अभियुक्त के अनुरोध करने पर मान0 न्या0 या पुलिस जमानत देती है जबतक मान0न्या0 मे मामला चल रहा है तब तक अभियुक्त को जेल से रिहा किया जा सकता है इस प्रकार के प्रकरण प्रायः तीन वर्ष से कम सजा वाले अपराध होते है ऐसे प्रकरण मे अभियुक्त को जमानत पाने का अधिकार है ।
2.अजमानतीय अपराध-
अजमानतीय अपराध वह अपराध है जिसमे अभियुक्त जमानत पाने का अधिकार नही है मान0 न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है कि जमानत दी जाए या नही अजानतीय अपराध सामान्यतः03 वर्ष से अधिक के दण्ड वाले अपराध है।
यहां SOP दी गयी है FIR सम्बंधित
यह दस्तावेज़ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत FIR दर्ज करने और प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry) के संबंध में मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का हिंदी अनुवाद है:
FIR पंजीकरण और प्रारंभिक जांच (PE) के संबंध में SOP
कार्यक्षेत्र (Scope)
यह SOP उन सभी पुलिस अधिकारियों के लिए है जो FIR के पंजीकरण और प्रबंधन में शामिल हैं, जिनमें थाना प्रभारी (SHO), जांच अधिकारी (IO) और उनके पर्यवेक्षी अधिकारी शामिल हैं।
उद्देश्य
FIR पंजीकरण की प्रक्रिया को सरल और सभी नागरिकों के लिए सुलभ बनाना।
शिकायतों का समय पर और कुशल निपटान सुनिश्चित करना।
FIR पंजीकरण और प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना।
धारा 173, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023
यह धारा संज्ञेय अपराधों (Cognizable Offences) की सूचना से संबंधित है:
सूचना का माध्यम: संज्ञेय अपराध की सूचना मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी जा सकती है, चाहे अपराध किसी भी क्षेत्र में हुआ हो।
मौखिक सूचना: इसे लिखित रूप में लिया जाएगा, सूचना देने वाले को पढ़कर सुनाया जाएगा और उसके हस्ताक्षर लिए जाएंगे।
इलेक्ट्रॉनिक सूचना: इसे रिकॉर्ड पर तब लिया जाएगा जब सूचना देने वाला 3 दिनों के भीतर आकर उस पर हस्ताक्षर कर दे।
महिलाओं के विरुद्ध अपराध: यदि अपराध महिलाओं के विरुद्ध (BNS की धारा 64-71, 74-79, 124 आदि) है, तो सूचना केवल एक महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ही दर्ज की जाएगी।
दिव्यांग व्यक्तियों के लिए: यदि पीड़ित शारीरिक या मानसिक रूप से दिव्यांग है, तो पुलिस उनके घर या उनकी पसंद की जगह जाकर, दुभाषिए या विशेष शिक्षक की उपस्थिति में सूचना दर्ज करेगी। इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य है।
नि:शुल्क प्रति: FIR की एक प्रति सूचना देने वाले या पीड़ित को तुरंत और मुफ्त दी जाएगी।
FIR दर्ज करने के चरण (Steps for FIR Registration)
1. सामान्य FIR (यदि अपराध उसी थाने के क्षेत्र में हुआ हो)
चरण 1: मौखिक सूचना को लिखित रूप में दर्ज करें और पढ़कर सुनाएं।
चरण 2: सूचना देने वाले के हस्ताक्षर लें।
चरण 3: सूचना का सार सरकारी डायरी में दर्ज करें।
चरण 4: FIR की एक प्रति मुफ्त में तुरंत प्रदान करें।
2. ई-एफआईआर (e-FIR) – इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से
चरण 1: सूचना मिलते ही उसे जनरल डायरी (GD) में दर्ज करें।
चरण 2: सूचना देने वाले को पावती (Acknowledgment) भेजें और बताएं कि 3 दिनों के भीतर हस्ताक्षर करना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
चरण 3: यदि पीड़ित आने में असमर्थ है, तो पुलिस को स्वयं जाकर हस्ताक्षर लेने के प्रयास करने चाहिए।
चरण 4: हस्ताक्षर होने के बाद FIR दर्ज कर प्रति प्रदान करें।
3. जीरो एफआईआर (Zero FIR)
यदि अपराध उस थाने के अधिकार क्षेत्र से बाहर हुआ है:
SHO बिना नंबर की FIR (Zero FIR) दर्ज करेगा।
इसे तुरंत संबंधित थाने में स्थानांतरित (Transfer) किया जाएगा।
यदि तुरंत चिकित्सा सहायता (जैसे चोट या यौन हमला) की आवश्यकता है, तो उसी थाने द्वारा उपचार और जांच की सुविधा दी जाएगी।
प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry – PE)
धारा 173(3) BNSS के अनुसार, उन अपराधों में जिनमें सजा 3 से 7 साल के बीच है, SHO DSP स्तर के अधिकारी की अनुमति से 14 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच कर सकता है ताकि यह पता चल सके कि मामला आगे बढ़ाने लायक है या नहीं।
किन मामलों में PE की जा सकती है (ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसार):
वैवाहिक/पारिवारिक विवाद
व्यावसायिक अपराध (Commercial Offences)
चिकित्सा लापरवाही (Medical Negligence)
भ्रष्टाचार के मामले
रिपोर्टिंग में असामान्य देरी (3 महीने से अधिक की देरी)।
जांच के चरण:
SHO वस्तुनिष्ठ रूप से आकलन करेगा कि क्या PE आवश्यक है (यह अनिवार्य नहीं है)।
PE के लिए DSP या उससे ऊपर के अधिकारी से लिखित अनुमति लेनी होगी।
PE को 14 दिनों के भीतर पूरा करना होगा।
यदि मामला बनता है, तो FIR दर्ज कर जांच शुरू की जाएगी। यदि नहीं, तो सूचना देने वाले को कारणों के साथ सूचित किया जाएगा।
सामान्य निर्देश
यदि सूचना से संज्ञेय अपराध प्रकट होता है, तो FIR दर्ज करना अनिवार्य है।
FIR की प्रति मुफ्त देना अनिवार्य है।
यदि SHO FIR दर्ज करने से मना करता है, तो पीड़ित व्यक्ति पुलिस अधीक्षक (SP) को लिखित में शिकायत भेज सकता है या मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर सकता है।रिपोर्ट, मुकदमा लिखवाने के लिए प्रार्थना पत्र की पूरी सरल जानकारी
इस पेज पर जो भी लिखा गया है वह आसान शब्दों में और आसानी से समझने के लिए ही लिखा गया है इसे लखने का इतना ही उद्देश्य है की सरलता से समझा जा सके

FIR लिखवाने के लिए दिए गए प्रार्थना पत्र में दिनांक घटना व  समय, घटना का स्थान,वादी मुकदमा का पूरा नाम पता,आरोपी का नाम (यदि पता हो), गवाहों के नाम और पूरे घटना का संक्षिप्त विवरण साफ-साफ प्रार्थना पत्र में अंकित करना चाहिए।

जब किसी व्यक्ति के साथ कोई घटना होती है तब वह व्यक्ति सबसे पहले प्रार्थना पत्र लिखकर उस थाने पर जाकर थानाध्यक्ष/प्रभारी निरीक्षक को देता है जिस थाना क्षेत्र में घटना घटित हुई हैं तब दिये गये उस लिखित प्रार्थना पत्र के आधार पर मुकदमा लिखा जाता है । इस स्थिति में सबसे पहले प्रार्थना पत्र लिखने की परेशानी उस व्यक्ति के सामने आती हैं यदि वह व्यक्ति प्रार्थना पत्र लिखना नहीं जानता है। जबकि सबसे अच्छा घटना के बारे में वही व्यक्ति जानता है जिसके साथ घटना घटित हुई हो या जिसने उसे देखा है । इसलिए सबसे अच्छा वही व्यक्ति उस घटना के सम्बन्ध में प्रार्थना पत्र लिख सकता है जिसके साथ घटना हुई है या जिसने देखा है। जब कोई दूसरा व्यक्ति प्रार्थना पत्र लिखता है तो वह लिखने वाला घटित घटना को बढ़ा देता है या घटा देता है।जब घटित घटना बिल्कुल सही प्रार्थना पत्र में न लिखा हो तो बाद में अभियुक्त को माननीय न्यायालय से सजा नहीं मिल पाता और वह बच जाता है इसलिए प्रार्थना पत्र स्वयं लिखना चाहिए तथा किसी भी स्थिति में दिये गये प्रार्थना पत्र में घटित घटना को बढ़ा चढ़ा कर नहीं लिखना चाहिए। जिससे दोषी को सजा दिलाया जा सके।
प्रार्थना पत्र लिखते समय क्या क्या ध्यान देना चाहिए और क्या क्या उसमें होना आवश्यक है।
1.जिसके तरफ से प्रार्थना पत्र दिया जा रहा है उसका पूरा नाम पता मोबाइल नंबर
2.घटना का दिनांक और समय
3.जहा पर घटना घटित हुई है
4.घटना कारित करने वाले व्यक्तियों का नाम पता (यदि नाम पता नहीं जानकारी है) तो अज्ञात जितना व्यक्ति हो ।
5.जिसके कारण घटना घटित हुई।
6.घटना करने वाले व्यक्तियों द्वारा जो जो अपराध किया गया है उसका संक्षिप्त विवरण।
इन छः बातों का होना आवश्यक है
प्रार्थना पत्र का प्रारुप।
1-जैसे किसी के द्वारा मारपीट करने गाली देने जान से मारने की धमकी देने वाली घटना करने पर प्रार्थना पत्र का प्रारुप।
सेवा में
प्रभारी निरीक्षक / थानाध्यक्ष महोदय
थाना ……………जनपद ………………
विषय – प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के सम्बन्ध मे प्रार्थना पत्र
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मै प्रार्थी ……………पुत्र………….ग्राम/ मोहल्ला …………..थाना …………जनपद …………..का निवासी हू दिनांक ………को समय करीब ………..बजे मैं अपने घर /खेत पर मौजूद था ( घटना स्थल का नाम)उसी समय 1….2…..3….. (अभियुक्तगण का नाम पता) वहां पर आये और पुराने रंजिश के कारण गाली देने लगे मेरे मना करने पर/विरोध करने पर मुझे सभी लोग मारने लगे जब मैं बचाने के लिए आवाज लगाया तो उक्त लोग जानसे मारने की धमकी देते हुए चले गए। (घटना का संक्षिप्त विवरण जो घटना की गयी है )
अतः श्रीमान जी से प्रार्थना है कि रिपोर्ट दर्ज कर आवश्यक कार्यवाही करने की कृपा करे
हस्ताक्षर प्रार्थी
नाम पता
मो0नं0
2-जैसे मोबाइल चोरी होने पर।
सेवा में
प्रभारी निरीक्षक / थानाध्यक्ष महोदय
थाना ……………जनपद ………………
विषय – प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के सम्बन्ध मे प्रार्थना पत्र
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मै प्रार्थी ……………पुत्र………….ग्राम/ मोहल्ला …………..थाना …………जनपद …………..का निवासी हू दिनांक ………को समय करीब ………..बजे मैं अपने घर /खेत पर मौजूद था ( घटना स्थल का नाम) मैं अपने मोबाइल को अपने पास रखें मेज/कुर्सी पर रखे था तथा काम कर रहा था जब करीब 1घटे बाद देखा तो मेरा मोबाइल वहां पर नहीं था मेरे मोबाइल में सिम कार्ड लगा था जिसका नम्बर 0000000000 है जो इस समय बन्द है कोई अज्ञात व्यक्ति मेरे मोबाइल को चोरी कर लिया है/…. व्यक्ति वहां मौजूद था….व्यक्ति मेरे मोबाइल को चोरी कर लिया है (….के स्थान पर अभियुक्त का नाम पता)
अतः श्रीमान जी से प्रार्थना है कि रिपोर्ट दर्ज कर आवश्यक कार्यवाही करने की कृपा करे
हस्ताक्षर प्रार्थी
नाम पता
मो0नं0
-3.जैसे मोटर साइकिल चोरी होने पर।
सेवा में
प्रभारी निरीक्षक / थानाध्यक्ष महोदय
थाना ……………जनपद ………………
विषय – प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के सम्बन्ध मे प्रार्थना पत्र
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मै प्रार्थी ……………पुत्र………….ग्राम/ मोहल्ला …………..थाना …………जनपद …………..का निवासी हू दिनांक ………को समय करीब ………..बजे मैं अपने खेत /फलां बाजार गया था फलां बाजार में रोड के किनारे मैं अपनी मोटर साइकिल स्पलेंडर /बुलेट नम्बर UP/MP 00=0000 खड़ा कर के बाजार( घटना स्थल का नाम) में गया लोटकर वापस आकर देखा तो मेरी मोटर साइकिल वहां पर नहीं थी मेरे मोटर साइकिल जिसका नम्बर UP/MP 00=0000 है को कोई अज्ञात व्यक्ति चोरी कर ले गया है।
अतः श्रीमान जी से प्रार्थना है कि रिपोर्ट दर्ज कर आवश्यक कार्यवाही करने की कृपा करे
हस्ताक्षर प्रार्थी
नाम पता
मो0नं0
पुलिस मुकदमा दर्ज न करे तब क्या करें ।पुलिस मुकदमा न लिखे तब क्या करें पूरी जानकारी सरल भाषा में।

जब किसी व्यक्ति के साथ अपराध होता है, तो सबसे पहला कदम पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना होता है। इस रिपोर्ट को FIR कहा जाता है। FIR दर्ज होने के बाद ही पुलिस मामले की स्थानीय आधिकारिक में जांच शुरू करती है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि जब पीड़ित व्यक्ति थाने में शिकायत लेकर जाता है तो पुलिस FIR दर्ज न करके टाल देती है। ऐसी स्थिति में पीड़ित व्यक्ति को यह समझ नहीं आता कि उन्हें आगे क्या करना चाहिए।अगर पुलिस FIR दर्ज नहीं करती है तो पीड़ित व्यक्ति पुलिस अधीक्षक (SP) को लिखित शिकायत दे सकता है। इसके अलावा न्यायालय में धारा 156(3) के तहत आवेदन देकर भी FIR दर्ज कराई जा सकती है।

Crpc नागरिकों को यह अधिकार देता है कि यदि उनके साथ कोई संज्ञेय अपराध हुआ है तो पुलिस FIR दर्ज करने के लिए बाध्य है। यदि पुलिस ऐसा नहीं करती है, तो पीड़ित व्यक्ति के पास कई विकल्प उपलब्ध होते हैं। उच्च अधिकारी गण व माननीय न्यायालय  में आवेदन कर मुकदमा दर्ज करा सके।

FIR क्या है
– FIR का पूरा नाम First Information Report होता है। Fir यह वह लिखित रिपोर्ट होती है जिसे पुलिस किसी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर दर्ज करती है। FIR दर्ज होने के बाद पुलिस जांच/विवेचना शुरू करती है पुलिस रेगुलेशन पारा 106 से 122 तक की सभी कार्रवाई पूर्ण करते हुए दोषी पाए जाने पर आरोपी के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करते हुए आरोप पत्र प्रेषित करती है।
Crpc के अनुसार FIR दर्ज करने का प्रावधान crPC की धारा 154 के तहत किया गया है तथा मुकदमा कायमी के लिए पुलिस रेगुलेशन पैरा 99 में स्पष्ट उल्लेख है। इस धारा के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलती है, तो पुलिस को उसकी शिकायत दर्ज करनी होती है।
संज्ञेय अपराध क्या होता है।
संज्ञेय अपराध वह अपराध होता है जिसमें पुलिस बिना वारंट के आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है और तुरंत जांच/विवेचना शुरू कर सकती है।
संज्ञेय अपराध के उदाहरण:
हत्या,बलात्कार,डकैती,चोरी,अपहरण गंभीर शरीर संबंधी अपराध या संपत्ति संबंधी अपराध आदि
यदि इन जैसे अपराधों की सूचना पुलिस को दी जाती है तो पुलिस के लिए FIR दर्ज करना अनिवार्य होता है।
पुलिस FIR दर्ज क्यों नहीं करती है-
कई बार पुलिस विभिन्न कारणों से FIR दर्ज करने में आनाकानी करती है। इसके कुछ सामान्य कारण हो सकते हैं:
जैसे -मामले को छोटा समझना,जांच की जिम्मेदारी से बचना, आरोपी का प्रभावशाली होना,पुलिस का काम बढ़ने का डर, तुलनात्मक अपराध का अधिक हो जाना ।शिकायत को आपसी विवाद बताकर टालना ।हालांकि ये सभी कारण कानून के अनुसार उचित नहीं हैं। यदि संज्ञेय अपराध हुआ है तो पुलिस को FIR दर्ज करनी ही होगी।
पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें ।
यदि पुलिस FIR दर्ज नहीं करती है,
1. थाना प्रभारी से दोबारा लिखित शिकायत करें तथा रजिस्ट्री करें ।सबसे । कई बार मौखिक शिकायत पर पुलिस ध्यान नहीं देती, लेकिन लिखित शिकायत देने पर उसे स्वीकार करना पड़ता है।
शिकायत देते समय यह ध्यान रखें:
शिकायत स्पष्ट भाषा में लिखी हो , दिनांक घटना व समय
घटनास्थल तथा घटना का पूरा विवरण ,आरोपी/अभियुक्त का नाम (यदि पता हो) स्पष्ट लिखना चाहिए ।
यदि पुलिस शिकायत लेने से मना करती है, तो आप डाक के माध्यम से भी भेज सकते हैं।
2. पुलिस अधीक्षक महोदय को शिकायत करें
यदि थाना स्तर पर FIR दर्ज नहीं होती है, तो आप जिले के पुलिस अधीक्षक महोदय को शिकायत कर सकते हैं। इसके लिए आप लिखित आवेदन देकर पूरी घटना का विवरण बता सकते हैं।भारत में यह प्रावधान crpc की धारा 154(3) में दिया गया है। इसके अनुसार यदि थाना प्रभारी FIR दर्ज नहीं करता है तो पीड़ित व्यक्ति पुलिस अधीक्षक को शिकायत भेज सकता है।
पुलिस अधीक्षक महोदय शिकायत मिलने के बाद:
मामले की जांच करा सकते हैं ,थाने को FIR दर्ज करने का आदेश दे सकते हैं
3. ऑनलाइन शिकायत दर्ज करें
आजकल कई राज्यों में पुलिस की ऑनलाइन शिकायत प्रणाली उपलब्ध है। यदि थाना आपकी बात नहीं सुनता है, तो आप पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
ऑनलाइन शिकायत के फायदे: 1.शिकायत का रिकॉर्ड बन जाता है 2 उच्च अधिकारियों तक सीधे जानकारी पहुंचती है
कार्रवाई होने की संभावना बढ़ जाती है
4. मानवाधिकार आयोग या अन्य संस्थाओं में शिकायत
यदि मामला गंभीर है और पुलिस लगातार लापरवाही कर रही है, तो आप मानवाधिकार आयोग या अन्य संबंधित संस्थाओं में भी शिकायत कर सकते हैं। इससे मामले पर दबाव बनता है और जांच की संभावना बढ़ जाती है। CrPC के अनुसार पुलिस का यह कर्तव्य है कि वह संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर FIR दर्ज करे। यदि पुलिस जानबूझकर FIR दर्ज नहीं करती है, तो यह कर्तव्य का उल्लंघन माना जा सकता है।
5.माननीय न्यायालय में बाद दायर करें ।
यदि पुलिस और उच्च अधिकारी भी आपकी शिकायत पर कार्रवाई नहीं करते हैं, तो आप अदालत की शरण ले सकते हैं।
आप माननीय न्यायालय में आवेदन देकर FIR दर्ज कराने का आदेश प्राप्त कर सकते हैं। यह आवेदन crpc की धारा 156(3) के तहत किया जाता है।धारा 156(3) के अंतर्गत मजिस्ट्रेट पुलिस को आदेश दे सकता है कि वह FIR दर्ज करे और मामले की जांच शुरू करे।
शिकायत पत्र का प्रारूप ।
सेवा में
प्रभारी निरीक्षक / थानाध्यक्ष महोदय
थाना ……………जनपद ………………
विषय – प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के सम्बन्ध मे प्रार्थना पत्र
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मै प्रार्थी ……………पुत्र………….ग्राम/ मोहल्ला …………..थाना …………जनपद …………..का निवासी हू दिनांक ………को समय करीब ………..बजे मैं अपने घर /खेत पर मौजूद था ( घटना स्थल का नाम)उसी समय 1….2…..3….. (अभियुक्तगण का नाम पता) वहां पर आये और पुराने रंजिश के कारण गाली देने लगे मेरे मना करने पर/विरोध करने पर मुझे सभी लोग मारने लगे जब मैं बचाने के लिए आवाज लगाया तो उक्त लोग जानसे मारने की धमकी देते हुए चले गए। (घटना का संक्षिप्त विवरण जो घटना की गयी है )
अतः श्रीमान जी से प्रार्थना है कि रिपोर्ट दर्ज कर आवश्यक कार्यवाही करने की कृपा करे
हस्ताक्षर
प्रार्थी
नाम पता
मो0नं0
सेवा में
श्रीमान पुलिस अधीक्षक महोदय
जनपद ………………
विषय – प्रार्थी के साथ हुई घटना के संबंध में जांच करवा कर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर आवश्यक कार्यवाही हेतु संबंधित को आदेशित करने के संबंध में प्रार्थना पत्र
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मै प्रार्थी ……………पुत्र………….ग्राम/ मोहल्ला …………..थाना …………जनपद …………..का निवासी हू दिनांक ………को समय करीब ………..बजे मैं अपने घर /खेत पर मौजूद था ( घटना स्थल का नाम)उसी समय 1….2…..3….. (अभियुक्तगण का नाम पता) वहां पर आये और पुराने रंजिश के कारण गाली देने लगे मेरे मना करने पर/विरोध करने पर मुझे सभी लोग मारने लगे जब मैं बचाने के लिए आवाज लगाया तो उक्त लोग जानसे मारने की धमकी देते हुए चले गए। (घटना का संक्षिप्त विवरण जो घटना की गयी है )
अतः श्रीमान जी से प्रार्थना है कि प्रार्थना पत्र में वर्णित घटना घटना की जांच करा कर संबंधित को अभियोग पंजीकृत करने हेतु आदेशित करने की कृपा करें ।
हस्ताक्षर
प्रार्थी
नाम पता
मो0नं0
FIR दर्ज होने के बाद पुलिस निम्न कार्य करती है:
मामले की जांच शुरू करती है
गवाहों के बयान लेती है
सबूत इकट्ठा करती है
आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है
जांच पूरी होने के बाद साक्ष्य के आधार पर आरोपी के विरुद्ध पुलिस अदालत में चार्जशीट दाखिल करती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिकायत करते समय सही जानकारी और प्रमाण प्रस्तुत करें। इससे आपकी शिकायत पर कार्रवाई होने की संभावना बढ़ जाती है और न्याय मिलने का रास्ता आसान हो जाता है।
झूठा/गलत मुकदमा लिखना अपराध है इसलिए गलत मुकदमा ना लिखाएं।FIR और NCR में क्या अंतर है
FIR और NCR में क्या अंतर है सामान्य जानकारी

जब किसी अपराध की जानकारी पुलिस को दी जाती है तो पुलिस उस सूचना को अलग-अलग प्रकार से दर्ज करती है। आमतौर पर दो प्रकार की रिपोर्ट दर्ज की जाती हैं – FIR (First Information Report) और NCR (Non-Cognizable Report)।
FIR और NCR में क्या अंतर है,
किस स्थिति में FIR दर्ज होती है और कब NCR लिखी जाती है । यदि किसी व्यक्ति के साथ अपराध होता है तो उसे यह जानना बहुत जरूरी है कि उसका मामला संज्ञेय अपराध है या असंज्ञेय अपराध, क्योंकि इसी के आधार पर पुलिस FIR या NCR दर्ज करती है।
इस लेख में हम सरल भाषा में समझेंगे कि FIR और NCR क्या होती है, दोनों में क्या अंतर है।

FIR क्या होती है
FIR का पूरा नाम First Information Report होता है। यह किसी संज्ञेय अपराध की पहली लिखित सूचना होती है जो पुलिस थाने में दर्ज की जाती है।
जब किसी व्यक्ति के साथ कोई गंभीर अपराध होता है, जैसे चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार या अपहरण, मूल रूप से शरीर संबंधी या संपत्ति संबंधी,तो वह पुलिस को इसकी सूचना देता है। पुलिस उस सूचना को लिखित रूप में दर्ज करती है और उसे FIR कहा जाता है। FIR पुलिस 154 CrPC के तहत और NCR को 155 CrPC के तहत दर्ज करती है
FIR दर्ज होने के बाद पुलिस को यह अधिकार मिल जाता है कि वह मामले की जांच शुरू करे,और साक्ष्य एकत्र करे। यदि पर्याप्त साक्ष्य मिले तो आरोपी को गिरफ्तार करे तथा विवेचना कर आरोप पत्र न्यायालय प्रेषित करे । यदि साक्ष्य पर्याप्त नहीं है तो साक्ष्य के अभाव में अंतिम रिपोर्ट प्रेषित करें।
FIR की मुख्य विशेषताएं
FIR केवल संज्ञेय अपराधों में दर्ज होती है।
पुलिस सीधे जांच शुरू कर सकती है।
पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तारी कर सकती है।
FIR की एक प्रति शिकायतकर्ता को मुफ्त दी जाती है।
FIR दर्ज होने के बाद मामला कानूनी प्रक्रिया में चला जाता है।
FIR दर्ज कराने के लिए आवश्यक जानकारी
FIR लिखवाते समय निम्नलिखित जानकारी देना आवश्यक होता है:
शिकायतकर्ता का नाम और पता
घटना की तारीख और समय
घटना का स्थान
घटना का पूरा विवरण
आरोपी का नाम (यदि पता हो)
गवाहों की जानकारी (यदि उपलब्ध हो)
इन सभी जानकारी के आधार पर पुलिस FIR दर्ज करती है और विवेचना शुरू करती है।
NCR क्या होती है
NCR का पूरा नाम Non-Cognizable Report होता है। यह उन मामलों में दर्ज की जाती है जो असंज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं।
असंज्ञेय अपराध ऐसे अपराध होते हैं जिनमें पुलिस को तुरंत गिरफ्तारी करने या विवेचना शुरू करने का अधिकार नहीं होता। ऐसे मामलों में पुलिस केवल शिकायत दर्ज करती है और उसे NCR कहा जाता है।
NCR दर्ज होने के बाद पुलिस सीधे जांच शुरू नहीं करती। इसके लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति आवश्यक होती है।
NCR की मुख्य विशेषताएं
NCR असंज्ञेय अपराधों में दर्ज होती है।
पुलिस बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के जांच नहीं कर सकती।
पुलिस बिना वारंट गिरफ्तारी नहीं कर सकती।
NCR सामान्यतः कम गंभीर मामलों में दर्ज की जाती है।
NCR के उदाहरण
कुछ सामान्य मामले जिनमें NCR दर्ज हो सकती है:
गाली-गलौज
साधारण मारपीट
छोटे विवाद
मानहानि
झगड़ा या हल्का विवाद
इन मामलों में पुलिस पहले NCR दर्ज करती है और आवश्यकता होने पर मजिस्ट्रेट से अनुमति लेकर आगे की कार्रवाई करती है।
FIR और NCR में मुख्य अंतर
अपराध का प्रकार
संज्ञेय अपराध FIR
असंज्ञेय अपराध NCR
जांच
पुलिस तुरंत जांच कर सकती है FIR
मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी NCR
गिरफ्तारी
बिना वारंट गिरफ्तारी संभव FIR
बिना वारंट गिरफ्तारी नहीं NCR
गंभीरता
गंभीर अपराध FIR
कम गंभीर अपराध NCR
अगर पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें
कभी-कभी ऐसा होता है कि पुलिस संज्ञेय अपराध होने के बावजूद FIR दर्ज नहीं करती। ऐसी स्थिति में निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:
पुलिस अधीक्षक (SP) को लिखित शिकायत दें।
डाक या ऑनलाइन माध्यम से शिकायत भेजें।
न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत करें।
अदालत के आदेश के बाद पुलिस को FIR दर्ज करनी पड़ती है।
FIR और NCR के बारे में जानकारी होना हर नागरिक के लिए जरूरी है क्योंकि इससे लोगों को अपने अधिकारों की जानकारी मिलती है। यदि किसी व्यक्ति को यह पता होगा कि उसका मामला FIR का है या NCR का, तो वह पुलिस से उचित कार्रवाई की मांग कर सकता है।
कई बार जानकारी के अभाव में लोग यह समझ नहीं पाते कि पुलिस ने NCR क्यों दर्ज की है और FIR क्यों नहीं लिखी।
FIR और NCR दोनों ही पुलिस द्वारा दर्ज की जाने वाली महत्वपूर्ण रिपोर्ट हैं। FIR गंभीर अपराधों में दर्ज होती है और पुलिस को तुरंत कार्रवाई करने का अधिकार देती है, जबकि NCR कम गंभीर मामलों में दर्ज की जाती है और इसमें पुलिस को जांच करने से पहले मजिस्ट्रेट की अनुमति लेनी पड़ती है।
इसलिए प्रत्येक नागरिक को FIR और NCR के बीच का अंतर समझना चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर वह सही कानूनी प्रक्रिया अपना सके और अपने अधिकारों की रक्षा कर सके।
नोट-इस ब्लॉग पर प्रकाशित सभी जानकारी केवल सामान्य शैक्षिक एवं सूचना के उद्देश्य से प्रदान की गई है। यह किसी भी प्रकार की कानूनी सलाह (Legal Advice) नहीं है। किसी भी विशेष मामले में कृपया योग्य अधिवक्ता या विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें। इस ब्लॉग पर दी गई जानकारी के उपयोग से होने वाले किसी भी लाभ या हानि के लिए लेखक/ब्लॉग उत्तरदायी नहीं होगा।”

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