रिमांड और जमानत

रिमांड क्या है
रिमांड के प्रकार
जमानत क्या है
जमानत के प्रकार
रिमांड और जमानत में अंतर
इस लेख के संबंध में:
यह सामग्री मुख्य रूप से स्वयं के अध्ययन, जानकारी को सुरक्षित रखने और आवश्यकता पड़ने पर संदर्भ के लिए लिखी गई है। यदि इससे किसी अन्य व्यक्ति को भी उपयोगी जानकारी मिलती है, तो यह हमारे लिए प्रसन्नता की बात होगी।
रिमाण्ड  क्या है ।
रिमाण्ड (Remand) का मतलब आसान भाषा में यह है कि जब किसी आरोपी को पुलिस गिरफ्तार करती है और 24 घंटे के अंदर जांच पूरी नहीं हो पाती, तो उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है। वहाँ पुलिस यह बताती है कि जांच आगे करने के लिए आरोपी की हिरासत क्यों जरूरी है। अगर मजिस्ट्रेट को लगता है कि आरोप पूरी तरह गलत नहीं हैं और जांच के लिए हिरासत जरूरी है, तो वह रिमाण्ड दे देता है।
रिमाण्ड के  प्रकार ।
रिमाण्ड मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है—
1.पुलिस अभिरक्षा
2.न्यायिक अभिरक्षा।
ट्रांजिट रिमांड एक विशेष स्थिति है।”
1. पुलिस अभिरक्षा (Police Custody)
इसमें आरोपी पुलिस के पास रहता है और उससे पूछताछ की जाती है।
2. न्यायिक अभिरक्षा (Judicial Custody)
न्यायिक अभिरक्षा में आरोपी को जेल भेज दिया जाता है।
पुलिस अभिरक्षा रिमाण्ड लेने के लिए विवेचक (IO) को साफ-साफ कारण बताने पड़ते हैं, जैसे पूछताछ करनी है, कोई सामान बरामद करना है या सबूत जुटाने हैं। साथ ही केस डायरी अपडेट रखना और मजिस्ट्रेट को पूरी जानकारी देना जरूरी होता है।
पुलिस अभिरक्षा रिमांड में बदलाव (BNSS 2023)
पहले नियम यह था कि पुलिस रिमाण्ड सिर्फ शुरुआती 15 दिनों के अंदर ही मिल सकता था। लेकिन अब नए कानून (BNSS, 2023) में थोड़ा बदलाव किया गया है। अब भी कुल पुलिस रिमाण्ड 15 दिन ही रहेगा, लेकिन इसे अलग-अलग दिनों में लिया जा सकता है
जिन मामलों में जांच के लिए 90 दिन का समय है, उनमें पहले 60 दिनों के अंदर यह 15 दिन का पुलिस रिमाण्ड लिया जा सकता है।
जिन मामलों में जांच के लिए 60 दिन का समय है, उनमें पहले 40 दिनों के अंदर यह 15 दिन का पुलिस रिमाण्ड लिया जा सकता है।

उदाहरण
मान लो किसी व्यक्ति को चोरी के मामले में गिरफ्तार किया गया तो उसे व्यक्ति के गिरफ्तारी के बाद से 60 दिन तक ही न्यायिक अभिरक्षा रिमांड मिलेगा । क्योंकि चोरी के मामले में दंड का समय 10 वर्ष से कम है यदि उस गिरफ्तार अभियुक्त से कोई उसी मुकदमे से संबंधित कोई वस्तु बरामद करनी है तो माननीय न्यायालय से पुलिस अभिरक्षा रिमांड प्राप्त किया जाएगा ।जो 40 दिवस से पहले होगा ।और 15 दिन से ज्यादा पुलिस अभी रक्षा रिमांड नहीं मिलेगा
यदि किसी अभियुक्त को हत्या, डकैती जैसे गंभीर अपराध मे गिरफ्तार किया गया है जिसमें दंड का विधान 10 वर्ष से अधिक है उस मामले में पुलिस को 90 दिवस तक का रिमांड माननीय न्यायालय से मिलेगा इस 90 दिवस से पहले ही रिमांड अवधि में विवेचना को पूर्ण करना तथा आरोप पत्र प्रेषित करना होगा। इस प्रकरण में भी आला कत्ल आदि की बरामदगी के लिए माननीय न्यायालय से पुलिस अभिरक्षा रिमांड प्राप्त किया जाएगा जो 15 दिन से अधिक का नहीं होगा ।
ट्रांजिट रिमांड(Transit Remand)
पुलिस द्वारा बिना वारंट के या न्यायालय द्वारा जारी वारंट के आधार पर गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य होता ।
किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस अधिकतम 24 घंटे तक ही अपनी हिरासत में रख सकती है। इसके बाद उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना आवश्यक होता है, अन्यथा यह गिरफ्तारी अवैध माना जाएगा।
ट्रांजिट रिमांड तब लिया जाता है जब पुलिस किसी आरोपी को ऐसे स्थान से गिरफ्तार करती है जहाँ उसका मामला दर्ज नहीं है, और उसे उस स्थान पर ले जाना होता है जहाँ संबंधित केस दर्ज है। ऐसी स्थिति में आरोपी को नजदीकी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाता है और वहाँ से उसे दूसरे स्थान पर ले जाने की अनुमति ली जाती है।
जमानत (Bail)
जब किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया जाता है और वह हिरासत में होता है, तो कोर्ट से जो जमानत मिलती है उसे नियमित जमानत (Regular Bail) कहा जाता है। यह जमानत तब दी जाती है जब कोर्ट को लगता है कि आरोपी के भागने, सबूत मिटाने या गवाहों को प्रभावित करने की संभावना कम है।
सरल शब्द में जमानत का मतलब है कि आरोपी को कुछ शर्तों के साथ अस्थायी रूप से छोड़ दिया जाए ताकि वह बाहर रहकर अपना मुकदमा लड़ सके और जरूरत पड़ने पर कोर्ट में हाजिर होता रहे।
1. नियमित जमानत
धारा 480 एवं 483 BNSS / धारा 437 एवं 439 Cr.P.C.
जब किसी अभियुक्त को पुलिस गिरफ्तार कर माननीय न्यायालय से न्यायिक अभिरक्षा रिमांड प्राप्त कर जिला कारागार में निरुद्ध कर देती है , तब वह अपनी रिहाई के लिए न्यायालय में नियमित जमानत (Regular Bail) का आवेदन कर सकता है। आरोपी की याचना पर यदि न्यायालय को लगता है कि आरोपी को जमानत पर छोड़ा जा सकता है, तब न्यायालय कुछ शर्तों के साथ जमानत प्रदान कर देता है।
नियमित जमानत वह जमानत है जो गिरफ्तारी के बाद ली जाती है। इसका उद्देश्य यह है कि आरोपी मुकदमे के अंतिम निर्णय तक अनावश्यक रूप से जेल में न रहे, लेकिन जब भी न्यायालय उपस्थित होने का आदेश करें, वह उपस्थित हो।
नियमित जमानत कब ली जाती है?
जब पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर चुकी हो।
जब आरोपी न्यायिक अभिरक्षा (Judicial Custody) में होता है
नियमित जमानत ,मामले की प्रकृति/गंभीरता के अनुसार:
न्यायिक मजिस्ट्रेट ,सत्र न्यायालय,उच्च न्यायालय से मिलता है
2.अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail)
अग्रिम जमानत (गिरफ्तारी से पहले) — धारा 482 BNSS / धारा 438 Cr.P.C.
यदि किसी व्यक्ति को यह उचित आशंका हो कि उसे किसी गैर-जमानती अपराध के मामले में गिरफ्तार किया जा सकता है, तो वह गिरफ्तारी से पहले ही न्यायालय से अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकता है।
अग्रिम जमानत वह कानूनी राहत है, जिसे कोई व्यक्ति गिरफ्तारी से पहले प्राप्त करता है।
अग्रिम जमानत का अर्थ गिरफ्तारी पर पूर्ण रोक नहीं है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि यदि गिरफ्तारी होती है तो व्यक्ति को तुरंत जमानत का लाभ मिल सकेगा।
अग्रिम जमानत कब ली जाती है?
जब किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी की उचित आशंका हो।
जब मामला गैर-जमानती अपराध से संबंधित हो।
जब व्यक्ति को यह विश्वास हो कि उसके विरुद्ध झूठा या दुर्भावनापूर्ण मुकदमा दर्ज किया जा सकता है।
अग्रिम जमानत का अधिकार सामान्यतः निम्न न्यायालयों के पास होता है—
सत्र न्यायालय (Sessions Court)
उच्च न्यायालय (High Court)
3.अंतरिम जमानत (Interim Bail)
आपराधिक मामलों में कई बार ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जब किसी अभियुक्त द्वारा नियमित जमानत (Regular Bail) या अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के लिए आवेदन किया जाता है, लेकिन उस आवेदन पर न्यायालय द्वारा अंतिम निर्णय होने में कुछ समय लग सकता है। ऐसी स्थिति में न्यायालय, परिस्थितियों को देखते हुए, सीमित अवधि के लिए अंतरिम जमानत (Interim Bail) प्रदान कर सकता है।
अंतरिम जमानत का उद्देश्य अभियुक्त को अस्थायी राहत देना है, ताकि अंतिम निर्णय होने तक उसकी स्वतंत्रता सुरक्षित रहे।
अंतरिम जमानत
अंतरिम जमानत वह अस्थायी जमानत है, जो न्यायालय किसी जमानत आवेदन पर अंतिम निर्णय आने से पहले सीमित अवधि के लिए प्रदान करता है। यह स्थायी जमानत नहीं होती, बल्कि केवल एक अंतरिम व्यवस्था होती है।
उदाहरण के लिए,
यदि किसी व्यक्ति ने अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया है और न्यायालय को अंतिम सुनवाई के लिए समय चाहिए, तो न्यायालय अगली सुनवाई तक अंतरिम जमानत दे सकता है।
न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार अंतरिम जमानत दे सकता है, जैसे—
जब नियमित या अग्रिम जमानत के आवेदन पर अंतिम सुनवाई शेष हो।
जब मामले में तुरंत गिरफ्तारी या निरुद्ध रहने से अपूरणीय क्षति होने की संभावना हो।
जब न्यायालय को प्रारंभिक रूप से राहत देना उचित प्रतीत हो।
जब अंतिम आदेश पारित होने तक अस्थायी संरक्षण आवश्यक हो।
अंतरिम जमानत कौन दे सकता है?
मामले की प्रकृति और अधिकार-क्षेत्र के अनुसार अंतरिम जमानत निम्न न्यायालयों द्वारा दी जा सकती है—
न्यायिक मजिस्ट्रेट
सत्र न्यायालय
उच्च न्यायालय
अंतरिम जमानत की सामान्य शर्तें
न्यायालय आवश्यकता के अनुसार निम्न शर्तें लगा सकता है—
निर्धारित तिथि पर न्यायालय में उपस्थित होना।
विवेचना में सहयोग करना।
गवाहों को प्रभावित या धमकाना नहीं।
साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करना।
या न्यायालय जैसा ठीक समझें। न्यायालय के विवेक अनुसार।
4.“डिफॉल्ट जमानत”
डिफॉल्ट जमानत — यदि आरोप-पत्र 90/60 दिनों के भीतर दाखिल नहीं किया जाता है — धारा 187(3) BNSS / धारा 167(2) Cr.P.C.
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अगर पुलिस समय पर विवेचना पूरी नहीं करती, तो आरोपी को “डिफॉल्ट जमानत” का अधिकार मिल जाता है। यानी—
गंभीर मामलों में 90 दिन के अंदर चार्जशीट दाखिल करनी होती है
कम गंभीर मामलों में 60 दिन के अंदर
गंभीर मामलों जिसमें 90 दिन के अंदर चार्जशीट दाखिल करनी होती है(मृत्यु दंड आजीवन कारावास या 10 साल से ऊपर की सजा वाले मामले किंतु 10 साल से कम ना हो)
कम गंभीर मामलों में 60 दिन के अंदर(10 साल से कम सजा वाले मामले में)
अपराध जिसमें सजा 10 वर्ष से कम है 60 दिन
अपराध जिसमें सजा 10 वर्ष या अधिक / आजीवन / मृत्यु दंड है 90 दिन
क्योंकि इससे ज्यादा दिन का रिमांड माननीय न्यायालय द्वारा विवेचना के लिए नहीं दिया जाता है इसलिए दौराने रिमांड विवेचना समाप्त कर देना चाहिए।आरोप-पत्र (Charge Sheet)  दाखिल कर देना चाहिए
आरोप-पत्र (Charge Sheet) — धारा 193(3) BNSS / धारा 173(2) Cr.P.C.
अगर ऐसा नहीं होता, तो आरोपी जमानत पाने का हकदार हो जाता है।
जमानत देते समय कोर्ट कई बातों को ध्यान में रखती है, जैसे
अपराध कितना गंभीर है
आरोपी का पिछला रिकॉर्ड क्या है
क्या वह भाग सकता है
क्या वह गवाहों को प्रभावित कर सकता है ,आदि।
जमानत मिलने के बाद आरोपी को कुछ शर्तों का पालन करना होता है, जैसे समय-समय पर कोर्ट में पेश होना, बिना अनुमति देश न छोड़ना और केस से जुड़े लोगों को प्रभावित न करना। अगर वह इन शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसकी जमानत रद्द भी हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है—“Bail is Rule, Jail is Exception”
यानी सामान्य स्थिति में जमानत देना ही नियम है और जेल भेजना अपवाद।
. जमानती अपराध (Bailable offence) –
इसमें आरोपी को आसानी से जमानत मिल जाती है। उसे बंधपत्र (bond) या निजी मुचलके पर छोड़ा जा सकता है। इसके लिए CrPC की धारा 436 और BNSS की धारा 478 लागू होती है। ऐसे मामलों में जरूरी नहीं कि आरोपी को थाने लाकर ही जमानत दी जाए, जहाँ वह जमानतदार दे दे, वहीं उसे छोड़ा जा सकता है।
2. गैर-जमानती अपराध (Non-bailable offence)
– इसमें जमानत देना या न देना कोर्ट के  विवेक पर निर्भर करता है।
ऐसे मामलों में आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है और अक्सर उसे न्यायिक अभिरक्षा (जेल) में भेज दिया जाता है।
रिमांड और जमानत में अंतर
सरल शब्दों में, रिमाण्ड विवेचना को सही तरीके से पूरा करने का दिया गया समय है, जबकि जमानत आरोपी को अस्थायी राहत देने का अधिकार है, ताकि वह बाहर रहकर अपना केस लड़ सके।
FIR क्या होती है?
Ans: FIR किसी संघीय अपराध के घटित होने की पुलिस में दर्ज की जाने वाली पहली रिपोर्ट होती है।

गिरफ्तारी कब होती है?
-जब कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराध करता है
-जब कोई व्यक्ति पुलिस के सामने अपराध करता है
-जब किसी अपराध के संबंध में उसके विरुद्ध पुख्ता सबूत हो कि उसने अपराध किया है या उसके पास अपराध से संबंधित कोई वस्तु मौजूद/कब्जे में है
-जब उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट माननीय न्यायालय से जारी किया गया है या वह उद्घोषित अपराधी है ।
-जब वह अपराध करने की तैयारी कर रहा हो
-जब अपराध करने के बाद उसके भाग जाने या साक्ष्य नष्ट करने की संभावना हो ।
-जब अपराध में संलिप्त अपराधी के प्रति सामान्य जनमानस के मन में असुरक्षा का भाव हो जाए । सामान्य जनमानस अपने को असुरक्षित महसूस करने लगे।
“न्यायिक अभिरक्षा रिमांड कब मिलता है”
“जब अभियुक्त के गिरफ्तारी के बाद मुकदमे की विवेचना 24 घंटे में पूरी नहीं की जा सकती है तब की स्थिति में माननीय न्यायालय से न्यायिक अभिरक्षा रिमांड की याचना की जाती है और रिमांड प्राप्त किया जाता है।” यह न्यायिक अभिरक्षा रिमांड है ।
न्यायिक अभिरक्षा रिमांड के दौरान अभियुक्त जिला कारागार में निरुद्ध रहता है ।
“पुलिस अभिरक्षा रिमांड कब मिलता है”
न्यायिक अभिरक्षा रिमांड के दौरान किसी अभियुक्त से कोई साक्षय या मुकदमे से संबंधित किसी वस्तु की बरामदगी करने के लिए माननीय न्यायालय से याचना करके पुलिस अभिरक्षा रिमांड प्राप्त किया जाता है जो निश्चित समय के लिए माननीय न्यायालय द्वारा दिया जाता है।
ट्रांजिट रिमांड कब मिलता है
जब किसी वांछित अभियुक्त की गिरफ्तारी किसी ऐसी जगह की जाए जहां से गिरफ्तारी के बाद अभियुक्त को अन्दर 24 घंटे सम्बंधित न्यायालय के समक्ष पेश नहीं किया जा सकता है तो उसे निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर ट्रांजिट रिमांड प्राप्त किया जाता है।
रिमांड के लिए
रिमांड सीट 202
FIR , नकल रपट कायमी
गिरफ्तारी मेमो फोटो कापी
कारण गिरफ्तारी
नकल रपट दाखिला
मेडिकल प्रपत्र अभियुक्त =मूल सीडी
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