यह लिखी गई सामग्री मुख्य रूप से स्वयं के जानकारी के लिए एकत्रित की गई है। इसका उद्देश्य अपनी जानकारी और अनुभवों को एक स्थान पर व्यवस्थित रखना है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर इन्हें आसानी से देखा और समझा जा सके।
किसी अपराध के सम्बन्ध मे आवश्यक बात ।
अपराध (Crime) समाज के लिए हानिकारक कार्य है, जो कानून द्वारा निषिद्ध होता है और जिसके लिए दंड का प्रावधान होता है। किसी भी संगठित समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपराध और उससे संबंधित सिद्धांतों की समझ होना आवश्यक है। आपराधिक दायित्व (Criminal Liability) के सिद्धान्त यह निर्धारित करते हैं कि किसी व्यक्ति को अपराध के लिए कब और कैसे उत्तरदायी ठहराया जाएगा।
अपराध-
सम्पूर्ण समाज के अधिकारो के अतिक्रमण के रूप मे किसी अधिकार का उल्लंघन अपराध है ।
अपराध विधि द्वारा दण्डनीय कार्य है क्योकी यह अधिनियम अथवा नियम द्वार निषिद्ध है या लोक हित के लिए हानिकारक है
अपराध को सामान्य शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है:
सम्पूर्ण समाज के अधिकारों के अतिक्रमण के रूप में किसी अधिकार का उल्लंघन अपराध है।
अपराध वह कार्य है जो विधि द्वारा दण्डनीय होता है क्योंकि:
वह अधिनियम या नियम द्वारा निषिद्ध है
वह लोकहित के लिए हानिकारक है
अपराधिक दायित्व के सिद्धान्त
-दुराशय, साधारण अपवाद, दुष्प्रेरण एव षडयन्त्र , संयुक्त एव आन्वयिक दायित्व ,आपराधिक प्रयत्न
अपराध के तत्व
किसी भी अपराध को सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित तत्व आवश्यक होते हैं:
अपराध करने वाला व्यक्ति एक मानव होना चाहिए
वह विधिक दायित्व के अधीन कार्य करने वाला हो
दुराशय
व्यक्ति के मन में अपराध करने की दोषपूर्ण मानसिकता होनी चाहिए
अपराधिक कृत्य
दुराशय को पूरा करने के लिए कोई कार्य किया गया हो
उस कार्य से किसी व्यक्ति या समाज को क्षति पहुँची हो
इन तत्वों के बिना अपराध सिद्ध नहीं होता।
कार्य और आशय का सिद्धान्त
कार्य-
कार्य स्वय किसी को दोषी नही बनाता जब तक कि उसका आशय वैसा न रहा हो । इसी उक्ति से – मेरे द्वारा मेरी इच्छा के विरूद्ध किया गया कार्य मेरा नही है ।
“कार्य स्वयं किसी को दोषी नहीं बनाता जब तक कि उसका आशय वैसा न हो।”
इसका अर्थ है कि:
केवल कार्य करने से अपराध सिद्ध नहीं होता
उस कार्य के पीछे की मानसिकता (Intent) भी महत्वपूर्ण है
यदि कोई कार्य व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध हुआ है, तो वह उसका अपराध नहीं माना जाएगा।
आशय
आशय इच्छा की वह कार्यवाही है जो किसी प्रत्यक्ष कार्य को दर्शित करती है ।
आशय कार्य का लक्ष्य है तथा हेतु उसका श्रोत है ।
हेतु- हेतु वह संवेग है जो इच्छा की कार्यवाही को प्रोतसाहित करता है या इच्छुक व्यक्ति का अन्तिम उद्देश्य है
मनः स्थित-
मनः स्थिति के दो तत्व है
प्रथम – कार्य को करने का आशय
दूसरा – उन दशाओ का ज्ञान जो उस कृत्य को दोषपूर्ण बना देती है
आशय इच्छा की वह प्रक्रिया है जो किसी कार्य को करने की दिशा में ले जाती है।
आशय कार्य का लक्ष्य होता है
यह व्यक्ति की मानसिक स्थिति को दर्शाता है
हेतु (Motive)
हेतु वह कारण है जो व्यक्ति को कोई कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।
यह व्यक्ति का अंतिम उद्देश्य होता है
आशय और हेतु अलग-अलग होते हैं
आशय = क्या करना है
हेतु = क्यों करना है
मनःस्थिति (Mental Condition)
किसी अपराध में मनःस्थिति के दो मुख्य तत्व होते हैं:
कार्य करने का आशय
उन परिस्थितियों का ज्ञान, जो उस कार्य को अपराध बनाती हैं
दोष सिद्ध करने का सिद्धान्त
अभियोजन (Prosecution) पर यह दायित्व होता है कि वह अपराध सिद्ध करे
अभियुक्त को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक उसका अपराध सिद्ध न हो जाए
किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार दंडित नहीं किया जा सकता। यह सिद्धान्त: संविधान के अनुच्छेद 20(2)
दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 300(1) में निहित है
आत्मदोषारोपण से सुरक्षा
कोई भी अभियुक्त स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता
यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 20 में दिया गया है।
सामान्य आशय
सामान्य आशय का अर्थ है:
पूर्व निर्धारित योजना के तहत कई व्यक्तियों का एक ही उद्देश्य से कार्य करना ।
आशय इच्छा की वह कार्यवाही है जो किसी प्रत्यक्ष कार्य को दर्शित करती है ।
आशय कार्य का लक्ष्य है तथा हेतु उसका श्रोत है ।
हेतु- हेतु वह संवेग है जो इच्छा की कार्यवाही को प्रोतसाहित करता है या इच्छुक व्यक्ति का अन्तिम उद्देश्य है
मनः स्थित- मनः स्थिति के दो तत्व है
प्रथम – कार्य को करने का आशय
दूसरा – उन दशाओ का ज्ञान जो उस कृत्य को दोषपूर्ण बना देती है
इसके आवश्यक तत्व:
एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा अपराध
सभी का एक समान उद्देश्य होना
पूर्व विचार-विमर्श या योजना
अपराध में सहभागिता
कुछ स्थितियों में सामान्य आशय घटना स्थल पर भी उत्पन्न हो सकता है।
संयुक्त एवं आन्वयिक दायित्व
जब कई व्यक्ति मिलकर अपराध करते हैं, तो सभी समान रूप से जिम्मेदार होते हैं, चाहे उनका योगदान अलग-अलग हो।
दुष्प्रेरण
1.एक व्यक्ति को अपराध कारित करने हेतु उकसाने द्वारा
2.एक अपराध कारित करने के लिए किसी षडयन्त्र मे सामिल होने द्वारा
3.एक अपराध कारित करने के लिए जानबूझ कर एक व्यक्ति की सहायता द्वारा
-दुष्प्रेरण तभी अपराध है जबकि दुष्प्रेरित कार्य स्वतः एक अपराध है भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत या तत्समय प्रवृत्ति किसी अन्य विधि के अन्तर्गत दण्डनीय हो ।
षडयंत्र
षडयंत्र के लिए आवश्यक है:
दो या दो से अधिक व्यक्तियों की सहमति
किसी अवैध कार्य को करने की योजना
विचारों का मिलन
जब तक योजना निश्चित न हो, तब तक षडयंत्र पूर्ण नहीं माना जाता।
-षडयन्त्र गठित करने के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियो के बीच सहमति होना आवश्यक है । सहमति का अर्थ एक विशिष्ट वस्तु के सन्दर्भ मे दो मस्तिष्को का मिलन (सम्मिलन) और जब एक वस्तु के विषय मे चर्चा होती है तब विचारो का आदान प्रदान होता है परन्तु जब तक दो या दो से अधिक षडयन्त्र कारी की सहमति द्वारा कार्यवाही की योजना निश्चित नही हो जाती तब तक अपराधिक षडयन्त्र की स्थिति या अवस्था को पहुचा हुआ नही माना जाएगा ।
आपराधिक प्रयत्न
जब कोई व्यक्ति अपराध करने की दिशा में कदम उठाता है लेकिन अपराध पूर्ण नहीं हो पाता, तो उसे आपराधिक प्रयत्न कहा जाता है।
साधारण अपवाद
कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति को दंड से छूट मिल सकती है:
आत्मरक्षा
पागलपन
दुर्घटना
बाल्यावस्था
अवैध आदेश का सिद्धान्त
अवैध कार्य के लिए: माता-पिता, मालिक, वरिष्ठ अधिकारी
का आदेश भी पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं देता ।
हालांकि, इसे दंड कम करने के लिए देखा जा सकता है।
निष्कर्ष
अपराध और आपराधिक दायित्व के सिद्धान्त समाज में न्याय और व्यवस्था बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। दुराशय और कृत्य के बिना अपराध सिद्ध नहीं होता। साथ ही, दुष्प्रेरण, षडयंत्र, सामान्य आशय और संयुक्त दायित्व जैसे सिद्धान्त यह सुनिश्चित करते हैं कि अपराध में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को उचित दंड मिल सके।
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