हिंदी वर्णमाला, समास और अलंकार | पूरी जानकारी और उदाहरण,हिन्दी भाषा हिंदी वर्णमाला क्या है
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इस पेज पर जो भी लिखा गया है वह आसान शब्दों में और आसानी से समझने के लिए ही लिखा गया है इसे लखने का इतना ही उद्देश्य है की सरलता से समझा जा सके।
हिंदी वर्णमाला में कितने अक्षर होते हैं
स्वर और व्यंजन क्या होते हैं
समास क्या है
समास के प्रकार
अलंकार क्या है
अलंकार के प्रकार
हिंदी व्याकरण में समास और अलंकार का महत्व
तत्पुरुष समास
द्वंद्व समास
बहुव्रीहि समास
और अलंकार में:
उपमा अलंकार
रूपक अलंकार
अनुप्रास अलंकार
हिन्दी व्याकरण नोट्स: वर्णमाला, अलंकार और समास
हिन्दी भाषा – वर्णमाला, वर्तनी, अलंकार और समास की संक्षिप्त जानकारी
हिन्दी वर्णमाला, अलंकार और समास – सरल नोट्स
हिन्दी भाषा की मूल बातें: वर्णमाला, अलंकार, समास और वर्तनी नियम
हिन्दी वर्णमाला से समास तक – सम्पूर्ण जानकारी
हिन्दी भाषा की वर्णमाला क्या है
स्वर और व्यंजन की जानकारी
हिन्दी में ई, यी, ए और ये का प्रयोग
अनुस्वार और अर्ध न का प्रयोग
अलंकार क्या है और इसके प्रकार
अनुप्रास, यमक और श्लेष अलंकार
उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा अलंकार
समास क्या है
समास के प्रकार
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण हिन्दी व्याकरण नोट्स
वर्णमाला –
एक सूत्र मे पिरोए गये वर्णो के समूह को वर्ण माला कहते है वर्ण अथवा अक्षर की कुल संख्या 52 है जिसमे कुल स्वर 11 तथा व्यंजन 41 है ।
स्वर- अ, आ ,इ ,ई, उ, ऊ,ऋ ,ए, ऐ ओ ,औ -कुल11
व्यंजन – (क वर्ग)- क, ख, ग, घ, ङ -कण्ठ स्थान
(च वर्ग)- च, छ, ज, झ, ञ – तालु स्थान
(ट वर्ग)- ट, ठ, ड, ढ, ण -मूर्ध्दा स्थान
(त वर्ग)- त, थ, द, ध, न -दन्त स्थान
(प वर्ग)- प, फ, ब, भ, म -ओष्ठ स्थान
य, र, ल, व,श
ष, स, ह क्ष, त्र, ज्ञ—–36.
.द्विगुण व्यंजन- ड, ढ के नीचे 0 होता है ।-02
.अनुस्वार – – अं, -01
.विसर्ग – अः -01
संयुक्त व्यंजन – क्ष, त्र, ज्ञ,श्र -04
अंतःस्थ व्यंजन- य, र, ल, व-04
ऊष्म व्यंजन- श, ष, स, ह- 04
हिन्दी लिखने मे ई और यी का उपयोग/ प्रयोग
हिन्दी भाषा मे वर्तनी के समय ई और यी तथा ए और ये एवं ए और यें का प्रयोग कहां और कब /कैसे करें ।
नोट- सबसे पहले हमे यह जानना है कि जिन शब्दो के अन्त मे ई आता है वे हमेशा संज्ञाये होती है क्रियाये नही होती है
प्रयोग हेतु उदाहरण –
1.मिठाई 2. सिचाई,निराई आदि
जिन शब्दो के अन्त मे जहां ई का लिखा है उनके स्थान पर या का प्रयोग कर हम देखे कि क्या कोई सार्थक शब्द बनता है या नही बनता है यदि सार्थक शब्द न बने तो ई का प्रयोग होगा अगर सार्थक शब्द बनता है तो य पर बडी ई का मात्रा लगा कर यी लिखते है ।
जैसे – 1. मिठाई मे ई के स्थान पर यदि या लगाया जाए तो मिठाया होगा जो सार्थक शब्द नही है इस लिए मिठाई मे ई का प्रयोग होता है ।
ठीक इसी प्रकार से ए और ये का प्रयोग –
जहां पर ए तथा ये लिखना है उस शब्द मे (य पर अ की मात्रा या) लगा कर देखे यदि सार्थक शब्द बनता है तो ये लगाए अन्यथा ए लगाए ।
वाक्य के बीच मे ये का प्रयोग और अन्त मे ए का प्रयोग होता है ।
जैसे -चाहिए मे ए के स्थान पर (या) लगाया जाए तो चाहिया हो जाएगा इसलिए चाहिये न होकर चाहिए शब्द सही है ।
इसी प्रकार यें और एं का प्रयोग –
जैसे शुभकामनाएं के अन्त मे (या)मात्रा लगाकर देखे कि सार्थक शब्द बनता है अथवा नही यदि या लगाया जाए तो शुभकामनाया होगा तो यह सार्थक शब्द नही है इसलिए शुभकामनाएं सही शब्द है इसी प्रकार अन्य शब्दो मे लगा कर देख लीजिए ।
अनुस्वार और अर्ध्द न् का प्रयोग –
जिस शब्द मे (त वर्ग) के किसी वर्ण के साथ न् भी प्रयुक्त हो तो एक ही वर्ग अथवा एक ही परिवारवर्ण के दो सदस्य साथ मे आते है तब वहाँ अनुस्वार का प्रयोग नही होता है और जहां एक वर्ग के केवल एक ही वर्ण आता है तब वहां पर न् का प्रयोग नही होता है केवल अनुस्वार का प्रयोग होता है । जैसे 1.अन्तर सही है अंतर गलत है 2.सन्देह सही है संदेह गलत है 3.सन्दर्भ सही है संदर्भ गलत है उपरोक्त उदाहरण मे त वर्ग मे त और न ,द और न ,एक ही वर्ण के सदस्य है इसलिए अर्द्ध न का प्रयोग होता है ।अनुस्वार का प्रयोग नही होता है ।
अलंकार
अलंकार का शाव्दिक अर्थ है गहना या आभूषण
-जिस कौशल के द्वारा काव्य मे रोचकता सरस्ता औऱ मधुरता उत्पन्न होती है उसी कौशल को अलंकार कहते है ।
-जिस प्रकार मनुष्य अपनी शोभा बढाने के लिए आभूषणो का प्रयोग करता है उसी प्रकार काव्य की शोभा एवं मधुरता बढाने के लिए अलंकार का प्रयोग किया जाता है ।
अलंकार के प्रकार –
अलंकार मूल रूप से दो प्रकार के होते है -1. शब्दालंकार 2.अर्थालंकार
परन्तु कुछ विद्वानो ने 3. उभयालंकार को मान्यता प्रदान किया है तथा कुछ विद्वानो ने 4. पाश्चात्यलंकार की भी अवधारणा स्वीकार किया है उपरोक्त अलंकारो के भी भेद है इसलिए कुल अलंकारो की संख्या लगभग 35 है इनकी मान्यताए विद्वानो ने दिया है ।
परीक्षा उपयोगी अलंकार-
शब्दालंकार-
1. अनुप्रास अलंकार-जहां एक ही वर्ण अथवा अक्षर बार-बार आता है वहां अनुप्रास अलंकार होता है ।उदाहरण -चारू चन्द की चंचल किरणे खेल रही है जल -थल मे ।नोट उपरोक्त उदाहरण मे च अक्षर की आवृत्ति बार बार हुई है इसलिए अनुप्रास अलंकार है ।
अनुप्रास अलंकार की पहचान -घुमि-घुमि एक अक्षर आवे ।
2.यमक अलंकार-
जहां एक ही शब्द बार -बार आये परन्तु उनके अर्थ अलग- अलग होते है वहां यमक अलंकार होता है ।
यमक अलंकार की पहचान – उहै शब्द फिरि फिरि परै अर्थ और ही और वहां यमक अलंकार है करना है क्या गौर ।
उदाहरण- कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय वह खाये बौराय जग यह पाये बौराय । स्पष्टीकरण – पहले कनक का अर्थ धतूरा और दूसरे कनक का अर्थ सोना (धन) दोनो स्थानो पर अर्थ अलग है इसलिए यमक अलंकार है ।
3.श्लेष अलंकार-
जहां एक ही शब्द के एक ही स्थान पर अनेक अर्थ हो जाते है वहां श्लेष अलंकार होता है ।
पहचान श्लेष अलंकार-एक शब्द चिपकाय करि दिये अनेको अर्थ वहां श्लेष का भाव है समय करो न व्यर्थ ।
उदाहरण – रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून ,पानी गये न ऊबरे मोती मानुस चून ।
स्पष्टीकरण- उपरोक्त उदाहरण मे पानी शब्द का अर्थ मोती के लिए चमक मानुस (मनुष्य) के लिए सम्मान और चूने के लिए जल है इस लिए एक स्थान पर आये पानी शब्द का अलग अलग अर्थ होने के कारण श्लेष अलंकार है
अर्थालंकार-
1.उपमा अलंकार- जहां एक बस्तु की तुलना किसी दूसरी बस्तु से किया जाए वहां उपमा अलंकार होता है।
अथवा-जहां एक बस्तु को दूसरी बस्तु के समान देखा जाए वहां उपमा अलंकार होता है
उदाहरण -बदन सुशोभित चन्द्र सम, नेत्र जलज सम होय ।
उपरोक्त उदाहरण मे मुख का चन्द्रमा के समान और नेत्र को कमल के समान माना गया है इसलिए उपमा अलंकार है ।
2.रूपक अलंकार-
जहां एक बस्तु को दूसरे बस्तु के रूप मे मान लिया जाय परन्तु रूपी शब्द स्पष्ट न हो वहा रूपक अलंकार होता है
संकेत /पहचान- बराबरी करने वाले दोनो शब्दो के बीच मे भेद मिटाने वाला रूपी शब्द छिपा होता है ।
उदाहरण-चन्द्र मुखी के नयन है कमल भृग मुस्काय ।
स्पष्ट- चन्द्र रूपी मुखवाली स्त्री अथवा चन्द्रमा के रूप वाली स्त्री के नयन ऐसे सुन्दर लग रहे है जैसे किसी कमल पंखुडी पर भौंरा प्रसन्न हो रहा हो ।
यहां चन्द्रमा को मुख के रूप मे माना गया है अतः रूपक अलं
कार है ।
3.उत्प्रेक्षा
अलंकार- जहां एक बस्तु को दूसरी बस्तु के रूप मे तो माना जाए परन्तु इसके वाचक शब्द मनु,जनु,मानो,जानो आदि आवें ।वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है ।
उदाहरण – विरह व्यथा इहि भांति समाना ,मानहु कमल पुष्प मुरझाना ।
स्पष्ट-उपरोक्त उदाहरण मे विरहणी का शरीर विरह वेदना से इस प्रकार सूख गया है ऐसा प्रतीत होता है मानो कमल पुष्प मुरझा गया हो ।
समास
समास – समास का अर्थ संक्षिप्तता से है अर्थात जब दो या दो सेअधिक शब्द आपस मे मिलकर एक नवीन शब्द का निर्माण करते है उसे समास कहते है ।
समास के भेद / प्रकार – समास छः प्रकार के होते है जो निम्नवत है –1.
द्वन्द समास 2.द्विगु समास 3. तत्पुरूष समास 4.कर्मधारय समास 5.अव्वायीभाव समास 6.बहुब्रीह समास
समास की पहचान – द्वन्द मे और छिपे ,द्विगु में पहला गणना पद आवत है ।जेहि बीच मे कारक चिन्ह छिपे तत्पुरूष समास कहावत है ।पहला पद जामें विशेषण है कर्मधारय नाम गनावत है ।अव्वय मे अव्वयीभाव रहे ,बहुब्रीह मे अन्य प्रधान रहे ।
1.द्वन्द समास
-जिस समासिक पद के बीच मे और शब्द छिपा होता है वहां द्वन्द समास होता है
उदाहरण- जल-थल , विग्रह करने पर जल और थल , अतः द्वन्द समास
द्विगु समास-
जिन सामासिक शब्दो (पदों) का पहला शब्द संख्यात्मक हो अर्थात गणना को व्यक्त करता हो वहां द्विगु समास होता है।
उदाहरण- अष्टधातु , विग्रह करने पर अष्ट है धातु । अतः द्विगु समास
तत्पुरूष समास-
जिन पदो मे कर्ता कारक और सम्बोधन कारक चिन्ह को छोडकर अन्य कोई भी कारक चिन्हो का लोप (छिपा) होता है वहां तत्पुरूष समास होता है ।
कारक चिन्ह पहचान- कर्ता “ ने ” है, कर्म “ को ” करण मे “ से के द्वारा ” सम्प्रदान “ के, लिए, को देने के अर्थ मे ”सारा अपादान के “ से ” से जानो, “ का,की,के ” सम्बन्ध अधिकरण है “ मे,पै,पर ”का रखता सब प्रबन्ध ।
उदाहरण – राजघाट , विग्रह करने पर ,राज्य का घाट ।
उपरोक्त मे का चिन्ह का लोप है अतः सम्बन्ध तत्पुरूष है
उदाहरण-2.भयाकुल ,विग्रह करने पर , भय से आकुल । अतः तत्पुरूष समास है ।
कर्मधारय समास-
जिसमे पहला पद विशेषण और दूसरा शब्द विशेष्य होता है वहां कर्मधारय समास होता है ।
उदाहरण -श्वैत पुष्प ,विग्रह करने पर ,श्वेत है पुष्प ,अतः कर्मधारय समास है
इसमे श्वेत पुष्प की विशेषता बता रहा है ।श्वेत विशेषण है और पुष्प विशेष्य है । अर्थात प्रधान है
उदाहरण-2. नीलाम्बुज ,विग्रह करने पर , नीला है अम्बुज । यहां नीला कमल की विशेषता बता रहा है अर्थात कर्मधारय समास है
अव्ययीभाव समास
-जिस सामासिक पद का पहला पद अव्वय होता है और वही मुख्य होता है वहां अव्ययीभाव समास होता है ।
अव्यय का अर्थ है जो व्यय न किया जा सके अर्थात जिस शब्द से कोई वर्ण हटा देने से कोई सार्थक शब्द नही रह सकता । अतः हम अव्यय शब्द से कुछ निकाल नही सकते ।
उदाहरण- यथाभाव – भाव के अनुरूप । यथादृष्टि – दृष्टि के अनुसार । प्रतिरूप – रूप के अनुरूप । प्रतिमाह – प्रतेक माह ।
बहुब्रीहि समास –
जिस सामासिक पद मे पहला और दूसरा दोनो शब्दो को छोडकर तीसरा शब्द प्राप्त होता है और वही प्रधान होता है बहुब्रीहि समास होता है ।
उदाहरण -गणपति , विग्रह करने पर ,गण के पति है जो अर्थात गणेश जी
2.कमलनयन , विग्रह करने पर , कमल के समान नेत्र है जिसके अर्थात
भगवान राम ।
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