रसों की संख्या और उनके स्थायी भाव

इस पेज पर जो भी लिखा गया है वह आसान शब्दों में और आसानी से समझने के लिए ही लिखा गया है इसे लखने का इतना ही उद्देश्य है की सरलता से समझा जा सके ।

भारतीय काव्यशास्त्र में रसों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। मूलतः रसों की संख्या 9 मानी गई थी, लेकिन बाद में आचार्यों ने 2 और रस (भक्ति और वात्सल्य) जोड़ दिए, जिससे कुल संख्या 11 हो गई है।
प्रमुख रसों की व्याख्या एवं उदाहरण –
1. करुण रस (शोक)
जब किसी काव्य, गीत या नाटक को देखकर मन में करुणा (दया) का भाव उत्पन्न होता है, वहाँ करुण रस होता है।
उदाहरण: “बताओ मेरा प्राण प्यारा कहाँ है। जहाँ का हमारे दुलारा कहाँ है।”
स्पष्टीकरण: उपरोक्त उदाहरण में अर्जुन का विलाप करना करुण रस को निष्पादित कर रहा है।
2. श्रृंगार रस (रति)
जहाँ नायक और नायिका का मिलना अथवा विछोहावस्था (अलगाव) में ‘रति’ नामक स्थायी भाव जागृत हो, उसे श्रृंगार रस कहते हैं। इसके दो प्रकार हैं:
(अ) संयोग श्रृंगार: जहाँ नायक और नायिका मिलते हैं।
उदाहरण: “राम को रूप निहारति जानकी, कंकन के नग की परछाईं।” (तुलसीदास)
(ब) वियोग श्रृंगार (विप्रलम्भ श्रृंगार): जहाँ नायक-नायिका बिछड़ जाते हैं।
उदाहरण: “हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी, तुम देखी सीता मृग नैनी।” (तुलसीदास)
3. हास्य रस (हास)
किसी विचित्र वेशभूषा, आकृति या चेष्टा को देखकर मन में जो हँसी का भाव उत्पन्न होता है, उसे हास्य रस कहते हैं।
उदाहरण: “खादी कुर्ता भकभका, चूने जैसी चाल। पाँव खड़ाऊँ सिर पर टोपी, गले पड़ी है माल॥”
4. वीर रस (उत्साह)
किसी कठिन कार्य को करने या युद्ध के लिए मन में जो उत्साह जागृत होता है, उसे वीर रस कहते हैं।
उदाहरण: “चल रहा महाभारत का रण, जल रहा धरित्री का सुहाग। फट कुरुक्षेत्र में खेल रही, नर के भीतर की कुटिल आग।” (रामधारी सिंह ‘दिनकर’)
5. रौद्र रस (क्रोध)
जब किसी दृश्य या अपमानजनक स्थिति को देखकर मन में क्रोध उत्पन्न हो, वहाँ रौद्र रस होता है।
उदाहरण: “दोनों रणकुशल धनुर्धर नर, दोनों सम्बल दोनों समर्थ। दोनों पर दोनों की अमोघ थी, विशिख वृष्टि हो रही व्यर्थ।”
स्पष्टीकरण: कर्ण और अर्जुन का युद्ध और उनका क्रोध रौद्र रस दर्शाता है।
6. भयानक रस (भय)
जब किसी भयानक दृश्य या वस्तु को देखकर मन में भय (डर) उत्पन्न हो, वहाँ भयानक रस होता है।
उदाहरण: “बालधी विसाल बिकराल ज्वाल-जाल मानों, लंक लीलिबे को काल रसना पसारी है।”
(तुलसीदास – हनुमान जी द्वारा लंका दहन का वर्णन)
7. अद्भुत रस (विस्मय)
किसी अलौकिक या आश्चर्यजनक वस्तु या दृश्य को देखकर मन में विस्मय का भाव उत्पन्न होना अद्भुत रस कहलाता है।
उदाहरण: “नौ-नौ हाथी मुजदण्ड पर मल्लखां तौले सांझ-विहान।” (मल्हवान का अदम्य साहस)
8. वीभत्स रस (जुगुप्सा/घृणा)
जब किसी घृणित वस्तु या दृश्य को देखकर मन में ग्लानि या घृणा उत्पन्न हो, वहाँ वीभत्स रस होता है।
उदाहरण: “रक्त से लथपथ शरीर को देखकर लोगों ने घृणा से मुँह फेर लिया।”
9. शान्त रस (निर्वेद)
जहाँ संसार के प्रति विरक्ति और ईश्वर के प्रति अनुराग का भाव हो, वहाँ शान्त रस होता है।
उदाहरण: “रहना नहीं देश बिराना है, यह संसार झाड़ और झाँखर, बाधि-बाधि मरि जाना है।” (कबीरदास)
10. भक्ति रस (ईश्वर अनुराग)
ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और श्रद्धा का भाव भक्ति रस कहलाता है।
उदाहरण: “मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै। जैसे उड़ि जहाज को पंछी, फिरि जहाज पर आवै॥” (सूरदास)
11. वात्सल्य रस (वत्सल)
माता-पिता का अपनी संतान के प्रति प्रेम वात्सल्य रस कहलाता है।
उदाहरण: “किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत। मनिमय कनक नन्द कै आंगन, बिम्ब पकरिबै धावत॥”
(सूरदास – कृष्ण की बाल लीला)
निष्कर्ष
इस प्रकार रस काव्य की आत्मा माने जाते हैं। इनके माध्यम से काव्य में भाव, सौंदर्य और प्रभाव उत्पन्न होता है, जिससे पाठक या श्रोता भाव-विभोर हो जाता है।

नोट-इस ब्लॉग पर प्रकाशित सभी जानकारी केवल सामान्य शैक्षिक एवं सूचना के उद्देश्य से प्रदान की गई है। यह किसी भी प्रकार की कानूनी सलाह (Legal Advice) नहीं है। किसी भी विशेष मामले में कृपया योग्य अधिवक्ता या विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें। इस ब्लॉग पर दी गई जानकारी के उपयोग से होने वाले किसी भी लाभ या हानि के लिए लेखक/ब्लॉग उत्तरदायी नहीं होगा।”

एक उत्तर दें